प्रमोद यादव की रिपोर्ट
बिलासपुर— सरकार की योजनाएं कागजों में भले ही गरीबों को पक्का मकान देने का दावा करती हों, लेकिन जनपद पंचायत कोटा अंतर्गत ग्राम पंचायत चपोरा के आश्रित ग्राम बासाझाल के बैगा मोहल्ला में हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। यहां बैगा जनजाति के जिन परिवारों को सम्मान और सुरक्षा देने के लिए आवास स्वीकृत हुए थे, वही परिवार आज भी अधूरे और रिसते मकानों में ज़िंदगी काटने को मजबूर हैं।
पीड़ित हितग्राहियों का आरोप है कि तत्कालीन पंचायत सचिव सुनीता मरावी द्वारा हितग्राहियों से ठेके पर आवास निर्माण कराया गया और प्रत्येक से करीब 2 लाख रुपये की पूरी राशि ले ली गई, लेकिन दो साल बीत जाने के बाद भी आवासों का निर्माण अधूरा है। जिन दीवारों ने सुरक्षा देनी थी, वही आज डर बन चुकी हैं।
बैगा समाज के अंजोर सिंह बैगा और फागुन सिंह बैगा ने दर्द बयां करते हुए बताया कि जो मकान बनाए गए, वे भी घटिया गुणवत्ता के हैं। बारिश आते ही छत से पानी टपकने लगता है, घर के अंदर पूरा फर्श गीला हो जाता है। बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं को खुले में बैठकर रात गुजारनी पड़ती है। सरकारी आवास, जो एक सुरक्षित भविष्य का सपना था, आज बैगा परिवारों के लिए चिंता और डर का कारण बन चुका है। इस मोहल्ले में 7- 8 आवास का यही स्थिति हैं l सवाल यह है कि जिन गरीब आदिवासी परिवारों से पूरी राशि ली गई, उनका कसूर क्या था? और आखिर कब तक बैगा जनजाति इस अन्याय को सहती रहेगी?
अब ग्रामीणों की मांग है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो, दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाए और अधूरे पड़े आवासों को तत्काल पूर्ण कराया जाए, ताकि बैगा परिवार भी सम्मान के साथ सुरक्षित जीवन जी सकें।

