जनसुनवाई से पहले ही सवालों में घिरी कोल वॉशरी परियोजना, ग्रामीणों ने कलेक्टर ऑफिस के बाहर प्रदर्शन कर जताया कड़ा विरोध

इमरान खान की रिपोर्ट

बिलासपुर —- कोटा विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत अमाली क्षेत्र में प्रस्तावित कोल वॉशरी परियोजना को लेकर ग्रामीणों में भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है। पर्यावरणीय जनसुनवाई से पहले ही कंपनी की ईआईए (EIA) रिपोर्ट और पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि जनसुनवाई केवल औपचारिकता बनकर रह गई है, जबकि ज़मीनी सच्चाई को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है। इसी कारण आज ग्रामीणों बिलासपुर कलेक्टर ऑफिस पहुंच कर कड़ा विरोध जताया गया हैं l

ग्रामीणों के अनुसार कंपनी की रिपोर्ट में अरपा बैराज की दूरी 6.30 किलोमीटर बताई गई है, जबकि वास्तविकता में दूरी इससे कम है। कोल वॉशरी खुलने से अरपा बैराज व आसपास के जलस्रोतों का पानी दूषित होने की आशंका है, जिससे सिंचाई, पेयजल और जीव-जंतुओं पर गंभीर असर पड़ेगा। पहाड़ों की कटाई से जंगल, औषधीय पौधे और वन्यजीवों के अस्तित्व पर संकट गहराने की बात कही गई है।

ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि कोटा क्षेत्र ग्रीन बेल्ट घोषित क्षेत्र है, जहां जंगल, पहाड़ और जैव विविधता मौजूद है। इसके बावजूद इसे औद्योगिक क्षेत्र में बदलने की कोशिश की जा रही है। ईआईए रिपोर्ट में जोगीपुर स्थित राष्ट्रीय उद्यान और प्राचीन मंदिरों का समुचित उल्लेख तक नहीं किया गया है, जबकि कुछ धार्मिक स्थल प्रस्तावित उद्योग से मात्र 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं।

कोल वॉशरी के कारण अमाली क्षेत्र से जुड़े चेचरी डैम, कोरी डैम सहित कई जलाशयों के पानी के प्रदूषित होने की आशंका जताई गई है। इससे किसानों की खेती प्रभावित होगी, धान की फसल खराब होने की संभावना है और ग्रामीणों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।

ग्रामीणों का यह भी कहना है कि जनसुनवाई से पहले ही लगभग 35 एकड़ भूमि पर अवैध निर्माण, बोर खनन और तालाब निर्माण करा लिया गया है, जो नियमों का खुला उल्लंघन है। वहीं कुछ लोगों की निजी जमीन बिना पंजीयन के कब्जा किए जाने का भी आरोप लगाया गया है।

सबसे गंभीर सवाल यह है कि जिस शासकीय निरंजन केशरवानी महाविद्यालय में जनसुनवाई आयोजित की गई, उसका नाम तक कंपनी की ईआईए रिपोर्ट में शामिल नहीं है, जबकि यह स्थल मात्र लगभग 300 मीटर की दूरी पर स्थित है।

ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि इस “फर्जी और भ्रामक” जनसुनवाई को तत्काल निरस्त किया जाए और संबंधित कंपनी के खिलाफ पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत सख्त कार्रवाई की जाए। चेतावनी दी गई है कि यदि मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो समस्त ग्रामीण न्यायालय की शरण लेने के साथ-साथ व्यापक जन आंदोलन के लिए बाध्य होंगे, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।

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