भ्रष्टाचार का मामला: स्वच्छ भारत मिशन की इमारत अब बनी गोदाम, जांच की मांग

कोटा विकासखंड के ग्राम पंचायत टाटीधार के आश्रित ग्राम भस्को में स्वच्छ भारत मिशन के तहत करोड़ों की योजना के अंतर्गत बनाए गए ठोस तरल अपशिष्ट प्रबंधन भवन में भ्रष्टाचार और लापरवाही का गंभीर मामला उजागर हुआ है। ग्रामीणों ने इस परियोजना की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है, क्योंकि जिस भवन को गाँव की स्वच्छता और अपशिष्ट प्रबंधन के लिए बनाया गया था, वह अब गोदाम बनकर रह गया है।

लगभग 8 लाख 8 हजार 13 रुपये की लागत से निर्मित यह भवन दस्तावेज़ों में पूर्ण दिखाया गया है, लेकिन वास्तविकता में अधूरा पड़ा हुआ है। भवन का दरवाजा बंद है, दीवारों पर अधूरे प्लास्टर के निशान हैं और अंदर सीमेंट की बोरियाँ और कबाड़ भरे हुए हैं। स्वच्छ भारत मिशन के नाम पर यह भवन आज बदहाली की तस्वीर बन चुका है।

इस कार्य की स्वीकृति 23 जुलाई 2021 को दी गई थी। 9 दिसंबर 2021 को कार्य प्रारंभ किया गया और 2 सितंबर 2023 को इसे पूर्ण बताया गया। कार्य की एजेंसी ग्राम पंचायत टाटीधार रही। उस समय पंचायत के सरपंच सम्मार सिंह सौता थे, जबकि वर्तमान में उनकी पत्नी संगीता सिंह सौता इस पद पर हैं। परियोजना की तकनीकी देखरेख पृथ्वीपाल कंवर (तकनीकी सहायक) ने की, और इस कार्य का सामाजिक अंकेक्षण प्रमोद देवांगन द्वारा किया गया, जबकि लोकपाल सुरेंद्र पांडेय थे।

भवन के निर्माण में कुल ₹8,08,013 स्वीकृत हुए थे, जिसमें से ₹45,366 श्रमिक भुगतान के रूप में दर्शाया गया है। कागजों में सब कुछ “पूरा” दिखाने के बावजूद, जमीनी सच्चाई इसके विपरीत है। भवन न तो ग्रामवासियों के उपयोग में है, न ही इसका उद्देश्य — गाँव के ठोस और तरल अपशिष्ट का वैज्ञानिक प्रबंधन — कहीं नजर आता है।

ग्रामवासियों का कहना है कि “स्वच्छ भारत मिशन” जैसी महत्वपूर्ण योजना का मज़ाक बना दिया गया है। उन्होंने बताया कि भवन का निर्माण अधूरा छोड़ दिया गया, और लंबे समय से इसमें किसी भी प्रकार का कार्य नहीं हुआ। एक ग्रामीण ने कहा —

“सरकारी पैसों से बनाई गई यह इमारत अब गोदाम बन गई है। यदि प्रशासन सही समय पर निगरानी करता, तो यह भवन गाँव की सफाई व्यवस्था में मदद कर सकता था।”

ग्रामीणों ने प्रशासन और पंचायत विभाग से यह भी सवाल किया कि जब भवन अधूरा है, तो इसे पूर्ण कैसे दिखा दिया गया? क्या बिना उपयोग में आए भवन पर पूरा भुगतान कर दिया गया है?

अब स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने इस पूरे मामले की पारदर्शी जांच की मांग की है। उनका कहना है कि जब “स्वच्छ भारत मिशन” जैसी केंद्रीय योजना के नाम पर इस प्रकार की लापरवाही होगी, तो सरकार की मंशा पर भी सवाल उठेंगे।

जनता का पैसा यदि विकास के बजाय भ्रष्टाचार में बह जाएगा, तो योजनाएँ अपने उद्देश्य से भटक जाएंगी। यह भवन न केवल प्रशासनिक उदासीनता का प्रतीक है, बल्कि यह दिखाता है कि “स्वच्छ भारत मिशन” जैसी योजनाओं का लाभ आम नागरिकों तक कैसे नहीं पहुँच पा रहा है।

ग्रामीणों की माँग है कि इस प्रकरण में तत्काल जांच कर संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के खिलाफ कार्यवाही की जाए, ताकि भविष्य में किसी भी सरकारी योजना में जनता के धन का इस तरह दुरुपयोग न हो।

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