समय से पहले बंद स्कूल, बच्चों के भविष्य पर ताला! नगचुई प्राथमिक शाला का मामला, BEO ने मांगा था 3 दिन में जवाब; शिकायतकर्ता का दावा—नोटिस के बाद भी नहीं बदले हालात

बिलासपुर — सरकार शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के बड़े-बड़े दावे करती है, नई शिक्षा नीति की बातें होती हैं और सरकारी स्कूलों में बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के सपने दिखाए जाते हैं। लेकिन जब यही सपने दूरस्थ गांव के सरकारी स्कूल की चौखट पर पहुंचते हैं, तो वहां कभी समय से पहले बंद दरवाजा मिलता है तो कभी शिक्षकों की कथित गैरहाजिरी का सवाल खड़ा हो जाता है।

कोटा विकासखंड के शासकीय प्राथमिक शाला नगचुई से सामने आया मामला सरकारी शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

शिकायतकर्ता रामविलास यादव के अनुसार, 8 जुलाई 2026 को दोपहर करीब 3 बजे स्कूल समय से पहले बंद मिला। उन्होंने तत्काल इसकी तस्वीर विकासखंड शिक्षा अधिकारी कोटा के मोबाइल पर भेजकर शिकायत की। शिकायत के बाद विभाग ने प्रभारी प्रधानपाठक सुधीर मानिकपुरी को कारण बताओ नोटिस जारी कर तीन दिवस में जवाब मांगा।

विभाग ने खुद माना नियमों के विपरीत बंद हुई शाला–***—

BEO कार्यालय कोटा के पत्र क्रमांक 688/स्था./2026 दिनांक 09/07/2026 में स्पष्ट उल्लेख है कि 8 जुलाई को दोपहर 3 बजे शाला बंद कर दी गई थी। पत्र में इस कृत्य को सिविल सेवा आचरण नियम, 1965 के विपरीत बताते हुए तीन दिवस में स्पष्टीकरण मांगा गया। जवाब संतोषजनक नहीं होने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए उच्च कार्यालय को भेजने की चेतावनी भी दी गई।

यानी मामला महज ग्रामीण की शिकायत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विभाग ने भी इस पर नोटिस जारी कर जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया शुरू की।

लेकिन सवाल यह है—नोटिस के बाद क्या बदला?

शिकायतकर्ता रामविलास यादव का आरोप है कि नोटिस जारी होने के बाद भी स्कूल की व्यवस्था में कोई खास सुधार नहीं हुआ। उनका कहना है कि शिक्षक समय पर स्कूल नहीं पहुंचते और कई बार स्कूल समय से पहले बंद कर दिया जाता है।

यदि ये आरोप सही हैं तो सवाल बेहद गंभीर है—क्या सरकारी स्कूल में बच्चों की पढ़ाई से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ और हो गया है l 

जिस स्कूल के दरवाजे पर गरीब और ग्रामीण परिवार अपने बच्चों का भविष्य छोड़कर जाते हैं, अगर उसी स्कूल का दरवाजा समय से पहले बंद हो जाए तो उस दरवाजे पर केवल ताला नहीं लगता, बल्कि किसी बच्चे के सपनों और उसके भविष्य पर भी ताला लग जाता है।

गरीब बच्चों की शिक्षा से खिलवाड़ कब तक —+++—

सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे ऐसे परिवारों से आते हैं, जो महंगे निजी स्कूलों का खर्च उठाने में सक्षम नहीं हैं। उनके माता-पिता इस भरोसे से बच्चों को स्कूल भेजते हैं कि शिक्षक उन्हें पढ़ाएंगे और उनका भविष्य बनाएंगे।

ऐसे में यदि स्कूल समय से पहले बंद हो, शिक्षक समय पर उपलब्ध न हों और शिकायतों के बाद भी व्यवस्था में सुधार न हो तो यह केवल विभागीय लापरवाही नहीं, बल्कि उन मासूम बच्चों के अधिकारों के साथ खिलवाड़ का सवाल बन जाता है।

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