बिलासपुर — जिस स्कूल की चौखट पर मां-बाप अपने बच्चों को इस भरोसे के साथ छोड़ते हैं कि यहां उनका बच्चा सुरक्षित रहेगा, वहीं अगर किसी बच्चे के साथ मारपीट हो जाए तो उस परिवार के दिल पर क्या गुजरती होगी, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। कोटा विकासखंड के प्राथमिक शाला बेलगहना में सामने आया मामला इसी भरोसे को झकझोर देने वाला है।
आरोप है कि दोपहर करीब 2 बजे एक पालक स्कूल परिसर के अंदर पहुंचा और चेतन श्रीवास के बच्चों के साथ मारपीट की। बताया जा रहा है कि जिस समय यह घटना हुई, उस समय स्कूल में पदस्थ दो शिक्षिका मौजूद थी। स्कूल परिसर में बच्चों के साथ कथित मारपीट की घटना ने न केवल विद्यालय की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि यह भी सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर स्कूल के अंदर पढ़ने वाले मासूम बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है?
बच्चे की पिटाई की खबर मिली तो दौड़े माता-पिता
अपने बच्चे के साथ स्कूल में मारपीट की जानकारी जब चेतन श्रीवास और उनकी पत्नी विनीता श्रीवास को मिली तो दोनों अपने बेटे की स्थिति और घटना की जानकारी लेने स्कूल पहुंचे। माता-पिता के लिए इससे ज्यादा पीड़ादायक क्षण और क्या होगा कि जिस बच्चे को सुबह अपने हाथों से स्कूल भेजा, उसी बच्चे के साथ स्कूल परिसर में मारपीट की खबर सुनकर उन्हें खुद स्कूल पहुंचना पड़ा।
बताया जा रहा है कि जब उन्होंने स्कूल पहुंचकर मामले की जानकारी चाही तो प्रधान पाठिका द्वारा कथित तौर पर यह कहा गया कि “आपका बच्चा लापरवाही करता है”, और इसके बाद उन्हें स्कूल से चले जाने के लिए कहा गया।
यह बात अब सवाल बनकर सामने खड़ी है—अगर बच्चे से कोई गलती हुई थी तो क्या उसे समझाने और अनुशासन सिखाने के लिए स्कूल में कोई व्यवस्था नहीं थी? क्या किसी बाहरी व्यक्ति को स्कूल के अंदर जाकर बच्चे पर हाथ उठाने की अनुमति दी जा सकती है? और सबसे बड़ा सवाल—जब स्कूल में शिक्षक मौजूद थे, तब बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी थी?
मासूमों के लिए स्कूल सुरक्षित है या नहीं?
स्कूल बच्चों के लिए सिर्फ एक इमारत नहीं होता। वह वह जगह होती है जहां माता-पिता अपने बच्चों को अपने भरोसे के साथ भेजते हैं। गरीब हो या मध्यमवर्गीय परिवार, हर माता-पिता की यही उम्मीद रहती है कि उनका बच्चा स्कूल से सुरक्षित, सम्मानित और कुछ नया सीखकर घर लौटेगा।
लेकिन अगर स्कूल की चारदीवारी के भीतर ही बच्चा खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे, तो सवाल सिर्फ एक बच्चे का नहीं रह जाता। सवाल पूरे स्कूल की व्यवस्था और बच्चों की सुरक्षा का बन जाता है।
चेतन श्रीवास ने मामले को लेकर ब्लॉक शिक्षा अधिकारी, कोटा से शिकायत की। शिकायत को गंभीरता से लेते हुए शिक्षा विभाग ने जांच टीम गठित कर दी है। अब जांच टीम की रिपोर्ट पर ही यह स्पष्ट होगा कि घटना के समय स्कूल में वास्तव में क्या हुआ था और किसकी भूमिका क्या रही।
अब जांच से है उम्मीद
परिवार की शिकायत के बाद जांच शुरू होना निश्चित रूप से एक जरूरी कदम है। लेकिन इस मामले में जांच केवल कागजों तक सीमित न रहकर बच्चों के हित और उनकी सुरक्षा को केंद्र में रखकर होनी चाहिए।
जांच में यह भी देखा जाना जरूरी है कि घटना के समय स्कूल में कौन-कौन मौजूद था, बच्चों के साथ कथित मारपीट कैसे हुई, शिक्षकों ने क्या कार्रवाई की, घटना के बाद स्कूल प्रबंधन ने क्या कदम उठाए और माता-पिता द्वारा लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है।
क्योंकि मासूम बच्चों की आंखों में डर पैदा करने वाला स्कूल, शिक्षा का मंदिर नहीं रह सकता।
एक बच्चे के हाथ में किताब होनी चाहिए, उसके मन में सवाल होने चाहिए, उसकी आंखों में भविष्य के सपने होने चाहिए—मार का डर नहीं।
अब निगाहें शिक्षा विभाग की जांच पर टिकी हैं। उम्मीद है कि जांच निष्पक्ष होगी, सच सामने आएगा और यदि किसी की लापरवाही या गलती सामने आती है तो नियमानुसार कार्रवाई होगी, ताकि भविष्य में किसी भी माता-पिता को अपने बच्चे को स्कूल भेजते समय यह डर न सताए कि जिस जगह वह शिक्षा लेने जा रहा है, वहां उसकी सुरक्षा कौन करेगा।

